बुधवार, 30 दिसंबर 2015

सूखी रोटी

सूखी रोटी लेकर दौड़ते मोती के पीछे भागा पिंटू,
मानो फिसलते रेत को पकड़ने का आखिरी मौका हो.

आज तो मिल जाए निवाला जो दिनों से न पाया,
मोती की स्पीड थी बहुत तेज पर आज पिंटू बन बैठा था मिल्खा सेठ.

रोक लिया उसने मोती को जैसे मोती चोर और पिंटू सिपाही हो,
खीचा तानी, गुर्र...गुरर्र.. हट भाग की गूंज में मानो  जिन्दगी बेबस हो.

आधी रोटी मोती की आधी पिंटू ने पाया
और आज कई दिनों बाद भूख को दोनों ने पछाडा.


शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

जनमाष्टमी उत्सव के रंग कान्हा के संग!!!

वृंदावन का नटखट ग्वाला;
मेरा प्यारा मुरलिवाला;
नन्ददुलारा मैया का लाडला;

आजा!!!!
तुझको निहारूं,  माखन मिश्री खिलादूं ;
अपने प्रेम के बंधन में  तुझको मैं बांधूं ;
झूम झूम मैं नृत्य करूं;
तेरी बंसी की धुन में रमूं ;
तू संग है मेरे तो मैं न डरूं ;

आओ आओ!!!!
सखियों बहनों;
मेंहदी रचा लो, कंगना पहन लो;
रंगों, पुष्पों से घर को सजालो;
जनमाष्टमी का उत्सव मनालो;
हर्षोल्लास से मंगल गाओ;
इस पावन दिन को खास बनालो।।।

                           ----- शिल्पी सिन्हा

ज्ञान अमृत

शिक्षक चाहे देना ज्ञान का उपहार;
अभिभावक   मांगे सुनिश्चत भविष्य का करार;
बच्चों की है समस्या जटिल;
अंकों पर  निर्भर है आगामी वर्ग का पुल;

सफलता के हैं कुछ गूढ़ तत्व;
मानो बच्चों तो पाओगे सारे प्रतिफल;
संयम,दृढ़ संकल्प, लक्ष्य की ओर पैनी नज़र
और जानो समय का महत्व,
मेहनत करो जमके और चखो जीत का स्वाद;

वंदना करो गुरु की;
महिमा बढ़ाओ बड़ों की;
मंज़िल तक पहुँच कर;
बनाओ  जीवन सफल खुद की।

बुधवार, 2 सितंबर 2015

दरारें

दरारें
रवि के ऐक्सीडेन्ट के बाद एक साल के भीतर ही पिताजी का देहांत हो गया। माँ की खामोशी हम चारों को खाए जाती थी। अब परिवार में मैं ही मर्द रह गया था। रवि मुझे जान से भी प्यारा था। छोटे भाई को पुत्र समान प्रेम दिया था मैंने। आज भी उसकी स्मृति आँखों में आँसू ले आती है। तीनों बहनों को भी रवि दिलोजान से प्यारा था। मात्र 16 वर्ष की उम्र में रवि मोटरसाइकिल चलाने में एक्सपर्ट था। सभी उसकी मोटरसाइकिल पर हलाईयात्रा कर प्रसन्न हो जाते थे। माँ और मैं हमेशा उसे आहिस्ता गाड़ी चलाने को कहते थे। पर हमारी सुनता कौन था? पर होनी को कौन टाल सकता है? इसी सनक ने एक दिन उसकी जान ले ली। उस दिन घर पर मातम पहली बार देखा वरना हमेशा मौज-मस्ती ही चलती रहती थी। दर्द के उस दौर में जी पाना बहुत कठिन था। फूआ के बच्चों से हम सभी बहुत जुडे थे। वे भी इस दुख को सह नहीं पा रहे थे। समूचा परिवार ही सदमे में था। पर जिसे हम परिवार का सबसे मजबूत हिस्सा मानते थे उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। पिताजी अंदर ही अंदर घुलते गए और मात्र 10 महीने भी नहीं बीते थे कि वे भी अपनी हृदय की चाप को बर्दास्त नहीं कर पाए और हार्ट अटैक के कारण चल बसे। रवि के जाने से सदमे में डूबा परिवार अचानक आधारविहीन हो गया और सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर आ गई। माँ तो शांत ही हो गयी। अब वो न रोती थी, न हँसती थी और न ही किसी से बातें करती थी। माँ की स्थिति से साफ पता चलता था कि भारतीय स्त्री अपने पति की ओर कितनी समर्पित होती है। उसका सर्वस्व उसका पति ही होता है। पति के बिना जीवन असह्य लगता है और मृत्यु ही प्रिय सखी मालूम होती है। माँ का भी उसी वर्ष देहांत हो गया।
मेरा हँसता खेलता परिवार दो वर्षों के भीतर ही सुनसान हो गया। कोई कहता था किसी ने मंत्र फूका है। कोई कहता किसी ने जादू – टोना किया है। कोई ईश्वर को दोषी ठहराता था। कोई कहता जो होना था वह तो हो गया अब आगे बढ़ो और परिवार की ज़िम्मेदारी संभालो। मैं नहीं जानता था कि मैं क्या करूँगा। एक तरफ तीन बहनों की ज़िम्मेदारी थी, दूसरी ओर मेरा कैरियर था। मैं खेल जगत में नाम कमाना चाहता था। बल्ले पर मेरा पक्का इख़्तियार था। जब मैं मैदान में उतरता था तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा स्टेडियम गूँज उठता था। सभी मेरे छक्कों और चौकों के लिए मेरा उत्साहवर्धन करते थे और मैं भी उन्हे कभी निराश नहीं करता था। मैं राज्य स्तर का खिलाड़ी था और जल्द ही राष्ट्र स्तर पर खेलने वाला था।
पिताजी की मृत्यु के उपरांत मुझे अनुकम्पा के आधार पर नौकरी मिली। परिवार के भले के बारे में सोंचते हुए मैंने वह नौकरी स्वीकार कर ली। ....खेलना छोड दिया। इस वक्त मेरी मंगेतर ने मेरा बहुत साथ दिया। उसका मेरे परिवार से बहुत स्नेह था। वह सबका हित चाहती थी। उसके माता-पिता ने जब शादी करने के लिए ज़ोर डाला तो उसने मेरी मन:सथ्ति को समझते हुए कहा कि वह अभी इंतज़ार करेगी। जब तक मैं शादी के लिए तैयार न हो जाऊँ वह न तो मुझ पर दबाव डालेगी न हा अपने माता-पिता के कहीं और शादी करने के प्रस्ताव को स्वीकार करेगी।
शशि अपने जीवन के इस नए मोड़ पर आ गया था। अब उसका सबसे पहला लक्ष्य था अपनी बहनों को अच्छी शिक्षा देना, उनकी शादी कराना और उनकी खुशियों का ख़्याल रखना। उसने माता-पिता दोनों की ज़िम्मेदारी ले ली। सविता ने भी हर कदम पर उसका साथ दिया। उन्होने सभी लड़कियों की शादी बड़े-बड़े घरानों में कर दी। इस दौरान उसकी सारी जमा-पूँजी, सविता के गहने सभी निकाल दिए गए। बहनों को खुश देख वे बड़ी ही खुशी से रहते थे।
परंतु पैसा बड़ा बलवान होता है। वह रिश्ते बनाता भी है और बिगाड़ता भी है। प्यार एक ऐसी डोर है जो रिश्तों को बांधे रखती है। प्यार और पैसे की तक़रार ने शशि के जीवन में हीनता और उदासी की एक लहर दौड़ा दी।
शशि की बहनें अपने परिवार में अपने ग़रीब भाई-भाभी को शामिल करने में झेंपती थीं। किसी से मुलाकात करवाने में उन्हें शर्म आती थी। पर वे दोनों कभी भी इसका बुरा नहीं मानते थे। चुप-चाप उनसे मुलाकात करते थे। पिता के समान शशि का दिल उन्हें देखे बिना नहीं मानता था।
उस दिन सविता अपनी सबसे ख़ूबसूरत साड़ी पहन कर तैयार हुई थी। शशि सविता की ख़ूबसूरती को सराहता हुआ बोला –सविता तुम जितनी सीरत से ख़ूबसूरत हो उतनी ही सूरत से भी। ये  बिंदी, चूड़ी, मोतियों की माला, लिप्सटिक, काजल, झुमका तुम्हे और भी ख़ूबसूरत बना रहे हैं।...................... सविता शर्माती हुई बोली – आप भी जी! मज़ाक न उड़ाइए। चलिए, देर हो रही है। शीतल की बेटी का पहला जन्मदिन है। मैं भी कई दिनों से उससे नहीं मिली।
शीतल, कमला, बिन्नी तीनों कीमती साड़ी, जवाहरात तथा शान-बान से सजी थीं। आज उनके लिए बड़ा दिन था। उन्होंने जब सविता को देखा तो हँसने लगीं – भाभी कभी तो तैयार हुआ करो। ये तो वही साड़ी है जो आपने कई आवसरों पर पहनी है। अपना नहीं तो हमारा ही ख्याल करती। क्या कहेंगे मेरे मेहमान? भैया आप भी, यहाँ ऐसे मत आया कीजिए। अब आ ही गए हैं तो खाइए और जाइए।
बहनों के ये स्वर शशि को तीर जैसे चुभ गए। जीवन भर की तपस्या का ये फल पाकर वह चूर-चूर हो गया। सविता जो उसके हृदय के सबसे समीप थी उसकी उन्होंने कई बार बेइज्ज़ती की थी पर आज शशि से रहा नहीं गया। वह वहाँ से सविता का हाथ थामे बिना कुछ बोले चला आया।
शीतल के मेहमान उसके घर वालों के बर्ताव को देख उसका उपहास करने लगे और बातें बनाने लगे। फिर शीतल और बाकी बहनें खाना लेकर शशि के पास आईं पर आज शशि ने ज़िम्मेदारी के बंधनों को तोड़ने का निश्चय कर लिया था। अब वह सम्मान व अपने प्यार के साथ जीवन बिताने का संकल्प कर चुका था। जब बहनें आईं तो उसने कहा – मैंने तुम लोगों के लिए अपने सपने, अपने जीवन सभी को स्वाहा कर दिया। और अब में तुम्हारे लिए शर्मिंदगी बन गया हूँ... समझ लो मैं तुम्हारे लिए मर गया। जाओ पैसे के बिस्तर पर सोओ। भाई का प्यार अब तुम्हे नहीं मिलेगा। फिर उसने दरवाज़ा बंद कर लिया। बहनें काफी देर तक दरवाज़े पर बैठी रहीं। कभी खुद को कोसतीं, कभी सविता को, कभी माँ-पिताजी को याद करतीं। अंदर शशि भी रोता रहा, परंतु उसने दरवाज़ा नहीं खोला।    


मालती

मालती
       अठारह वर्ष की उम्र में पहुँचते-पहुँचते मालती के मन ने भी उन सपनों को बुनना शुरु कर दिया था जो यौवनावस्था में सभी लड़कियाँ बुनती हैं। जीवन साथी के रूप में सच्चा प्यार करने वाले की चाह उसके मन में भी थी। एक ऐसा जीवन साथी जो उसके हर दुख:-सुख का साथी हो, जो उसे प्यार करे, उसका ख़्याल रखे, उसे अपने घर में इज़्जत भरा दर्जा दिलवाए। जिसे पाकर वह अपना सर्वस्व उस पर न्योछावर कर दे। सुखी जीवन की कल्पना मालती के मन में भी थी।
      रघु अधेड़ उम्र का मर्द था। जीवन में एक खूटे से बंधना उसे पसंद नहीं था। वह डाल-डाल पर जाकर रस चखने का शौकीन था। ढ़लती उम्र में उसने शादी करने का विचार किया, क्योंकि अब उसे कोई घास तक नहीं डालता था। रघु गाँव से शहर में आया था। गाँव के लोग समझते थे अब वह अपनी हरकतों से बाज आ चुका है। मेहनती बन गया है। खूब धन कमाने लगा है। मालती के माता-पिता से उसकी मुलाकात गाँव के स्टेशन पर हुई। मालती के पिता मालती की शादी में होने वाले खर्च तथा दहेज को लेकर दुखी थे। दहेज-प्रथा के कारण लड़कियाँ अपने माँ-बाप पर बोझ ही बन जाती है। मालती की माँ कहती है – रघु बाबू शादी की उम्र हो गयी है। जाने कब मालती का भाग्योदय होगा। लड़की जनना तो पाप ही बन गया है। अब तो लाखों रुपए दहेज हो गया है। क्या करेंगे हम? बड़े परेशान है। रघु कुछ नहीं बोला। फिर वे लोग अपने-अपने घर चले आए।
      छरहरे बदन वाली, कोमल नाज़ुक सी मालती बारामदे में माँ-पिताजी का इंतज़ार कर रही थी। वे पास के गाँव में शादी में गए थे। मालती गाँव की सबसे खूबसूरत लड़कियों में से एक थी। तीखे नैन-नक्श, पतले गुलाबी होठ, मीठी आवाज़ और उन्मुक्त हरकतों के कारण वह सब की चहेती और प्यारी थी। रघु ने जब मालती को देखा तो बेचैन हो गया। उसे पाना उसका लक्ष्य सा बन गया। वह बहाने से रोज़ उसके घर पहुँच जाता। मालती को उसका आना अच्छा नहीं लगता था। उसकी आँखों में बसी हैवानियत उसे साफ़ दिखती थी। पर वह किसी से कुछ बोलती नहीं थी। इधर रघु उसके माता-पिता से शादी की बात कर बैठा और दहेज में मात्र बीस हज़ार रुपए माँगे। मालती के माता-पिता ने इस पर विचार किया। अपने नाते-रिश्ते वालों से बातें की। सभी ने कहा लड़का तो अधेड उम्र का है, पर दहेज तो मानो कुछ भी नहीं है। लड़की का भाग्य विधाता ही जाने। तुम लोग ही सोचो क्या करना है? वैसे अगर लड़की के भाग्य में सुख है तो मिलेगा ही। हमारे विचार से शादी कर ही दो। कहाँ इधर-उधर भटकते फिरोगे। ईश्वर ने कुछ विचार कर ही यह रिश्ता भेजा होगा। मालती भी अपने माता-पिता की लाचारी के आगे सिर नहीं उठा पाई और देखते-देखते रघु की घरवाली बन गयी।
शादी के दिन ही रघु उसे घर ले आया। घर में रघु के आलावा सिर्फ एक चचेरा भाई था घनश्याम। रघु मालती को बस हवस पूरी करने का ज़रिया मानता था। न उससे बातें करता, न उसे देखता और न उसका ख़्याल रखता। वह शराब पीता, आती जाती लड़कियों/महिलाओं को छेड़ता और फिर यहाँ-वहाँ पड़ा रहता।
मालती के सारे अरमान पानी में बह गए। वह अब बस एक वस्तु मात्र थी। घर का सारा खर्च घनश्याम उठाया करता था। मालती बस अपना काम करती रहती थी। घनश्याम मालती की इज़्जत करता था। उसका ख़्याल रखता था। धीरे-धीरे मालती के मन में घनश्याम के प्रति प्यार का भाव पनपने लगा। वह उसे देखकर खुश होती थी। उसकी बातें, उसका चेहरा हर वक्त उसकी आँखों के सामने घूमता रहता था। मालती के मन में पनपा यह प्रेम-भाव अशरीरी था। वह सच्चे हृदय से उससे प्रेम करती थी। उसकी भलाई सोंचती थी। अब उसके जीवन का एक ही लक्ष्य था – घनश्याम को फलता-फूलता देखना। घनश्याम भी उसका बहुत आदर करता था। प्रेम का पवित्रतम रूप उनके रिश्ते को बांधे हुए था।

घनश्याम के ऑफिस में मीना काम करती थी। वह मन ही मन उसे चाहती थी। उसने अपनी चाहत का इज़हार करने की कोशिश कई बार की, पर कर न पाई। एक बार वह मालती से मिली इसने यह बात मालती को बताई। मालती अत्यंत प्रसंन हुई। कुछ समय बाद घनश्याम और मीना का ब्याह हो गया।

मीना मालती की तरह खूबसूरत नहीं थी और न ही उसमें सहनशक्ति थी। घर में आने के बाद मालती उसे रघु से मिलने नहीं देती थी, क्योंकि मालती रघु को अच्छी तरह जानती थी। पर मीना को इससे संदेह होने लगा। वह मामला समझने में असमर्थ थी। घनश्याम और मालती के बीच बने अपनेपन और प्रेम ने उसके मन में शररा बीज बो दिया। घनश्याम कई बार मालती का गुणगान किया करता था। मालती मन ही मन मालती से जलने लगी।

एक रोज़ रघु ने शराब के नशे में मालती को बहुत पीटा, इससे घनश्याम बहुत क्रोधित हो गया और रघु को घर से निकाल दिया। साथ ही उसने रोती-बिलखती मालती को गले से लगा लिया। उसी वक्त मीना आ गयी। उस दृश्य ने उसके शक को यक़ीन में परिवर्तित कर दिया। अब तो रोज़ ही लड़ाई होने लगी। मालती इस सब का दोषी खुद को मानने लगी। अब वह घनश्याम के कक्ष की ओर भी नहीं जाती थी। एक अजनबीपन उनके रिश्ते में पैठ गया। उधर मीना अपनेआप को सुरक्षित महसूस नहीं करती थी। वो आधुनिक मानसिकता की लड़की थी। पति से बंधे रहना, किसी भी हाल में ज़िंदगी गुज़ार लेना, उसे पसंद नहीं था। वह स्वतंत्र थी, स्वावलंबी थी, इसलिए उसने घनश्याम से रिश्ता तोड़ने का निश्चय किया। इसके लिए वह कोट तक गई। मालती और घनश्याम का पवित्र रिश्ता बदनाम होने लगा। मीना ने तलाक ले लिया। मालती को यह लांछन और अपने प्रिय घनश्याम की टूटी गृहस्थी ने बहुत द्रवित किया। उसने घर छोड़ने की ठान ली। वह रधु से कुछ बोलने का साहस भी नहीं कर पाती थी पर आज बोली – तुम तो कई बार कई स्त्रियों से संबंध बना चुके हो। क्या तुम्हें यक़ीन है कि मैं पवित्र हूँ। रघु ने तो इस बारे में कभी सोंचा ही नहीं वह बोला – पवित्र- वह क्या होता है? ऐश कर लिया तो कर लिया- अब जा। मालती निराश हो गयी। वह चुपचाप घर से निकल पड़ी। उसे नहीं पता था, वो कहाँ जा रही है? कैसे ज़िंदगी बिताएगी? बस घनश्याम के जीवन में अपनी छाया तक नहीं डालने के प्रयोजन से वह वहाँ से चली गयी।    


मैं

‘’मैं’’
       शि‍ल्‍पी सिन्हा

मुझे ‘’मैं’’ बनना है,
किसी की तस्‍वीर नहीं,
किसी की पहचान नहीं,
मुझे अपनी राह चुनना है।

क्‍यों मैं इनकी, उनकी सबकी राह पर चलूँ,
क्‍यों मैं आसमान में किसी के पदचिन्‍हों पर चलूँ,
मैं आजाद गगन की पंछी हूँ,
मुझे नए आयाम पाने दो।

ठोकरें भी मेरी हों,
राह भी मेरी हों,
मंजिल मिले तो मेरी,
और हार हो तो मेरी हो।

मेरी इच्‍छा से मैं सबको सुनूँ,
मेरी रूचि से मैं उनको चुनूँ,
किसी का सहारा लेकर नहीं,
खुद सहारा बन मैं मंजिल पर पहुँचूँ।


मंगलवार, 31 मार्च 2015

तुम्हारी चाहत

तुम्हारी चाहत

तुम्हें पाकर समझी कि दीवानगी कि राह पर कितना नशा है।
तुम धड़कन और मैं उसके धुन पर थिरकती नृत्यांगना हूँ।।


मेरी चाहतें जिनसे मैं बेखबर थीं।
तूने उन्हें साकार कर मुझे ज़िंदा किया।।


कभी जो राह भटकी मैं।
तूने नईं मंजिंलों का पता दिया।।

---शिल्पी सिन्हा