दरारें
रवि के ऐक्सीडेन्ट के बाद एक साल के भीतर
ही पिताजी का देहांत हो गया। माँ की खामोशी हम चारों को खाए जाती थी। अब परिवार
में मैं ही मर्द रह गया था। रवि मुझे जान से भी प्यारा था। छोटे भाई को पुत्र समान
प्रेम दिया था मैंने। आज भी उसकी स्मृति आँखों में आँसू ले आती है। तीनों बहनों को
भी रवि दिलोजान से प्यारा था। मात्र 16 वर्ष की उम्र में रवि मोटरसाइकिल चलाने में
एक्सपर्ट था। सभी उसकी मोटरसाइकिल पर हलाईयात्रा कर प्रसन्न हो जाते थे। माँ और
मैं हमेशा उसे आहिस्ता गाड़ी चलाने को कहते थे। पर हमारी सुनता कौन था? पर होनी को कौन
टाल सकता है? इसी सनक ने एक दिन उसकी जान ले ली। उस दिन घर पर
मातम पहली बार देखा वरना हमेशा मौज-मस्ती ही चलती रहती थी। दर्द के उस दौर में जी
पाना बहुत कठिन था। फूआ के बच्चों से हम सभी बहुत जुडे थे। वे भी इस दुख को सह
नहीं पा रहे थे। समूचा परिवार ही सदमे में था। पर जिसे हम परिवार का सबसे मजबूत
हिस्सा मानते थे उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। पिताजी अंदर ही अंदर घुलते गए और
मात्र 10 महीने भी नहीं बीते थे कि वे भी अपनी हृदय की चाप को बर्दास्त नहीं कर
पाए और हार्ट अटैक के कारण चल बसे। रवि के जाने से सदमे में डूबा परिवार अचानक
आधारविहीन हो गया और सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर आ गई। माँ तो शांत ही हो गयी। अब वो
न रोती थी, न हँसती थी और न ही किसी से बातें करती थी। माँ की स्थिति से साफ पता
चलता था कि भारतीय स्त्री अपने पति की ओर कितनी समर्पित होती है। उसका सर्वस्व
उसका पति ही होता है। पति के बिना जीवन असह्य लगता है और मृत्यु ही प्रिय सखी
मालूम होती है। माँ का भी उसी वर्ष देहांत हो गया।
मेरा हँसता खेलता परिवार दो वर्षों के
भीतर ही सुनसान हो गया। कोई कहता था किसी ने मंत्र फूका है। कोई कहता किसी ने जादू
– टोना किया है। कोई ईश्वर को दोषी ठहराता था। कोई कहता जो होना था वह तो हो गया
अब आगे बढ़ो और परिवार की ज़िम्मेदारी संभालो। मैं नहीं जानता था कि मैं क्या
करूँगा। एक तरफ तीन बहनों की ज़िम्मेदारी थी, दूसरी ओर मेरा कैरियर था। मैं खेल
जगत में नाम कमाना चाहता था। बल्ले पर मेरा पक्का इख़्तियार था। जब मैं मैदान में
उतरता था तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा स्टेडियम गूँज उठता था। सभी मेरे छक्कों
और चौकों के लिए मेरा उत्साहवर्धन करते थे और मैं भी उन्हे कभी निराश नहीं करता
था। मैं राज्य स्तर का खिलाड़ी था और जल्द ही राष्ट्र स्तर पर खेलने वाला था।
पिताजी की मृत्यु के उपरांत मुझे अनुकम्पा
के आधार पर नौकरी मिली। परिवार के भले के बारे में सोंचते हुए मैंने वह नौकरी
स्वीकार कर ली। ....खेलना छोड दिया। इस वक्त मेरी मंगेतर ने मेरा बहुत साथ दिया।
उसका मेरे परिवार से बहुत स्नेह था। वह सबका हित चाहती थी। उसके माता-पिता ने जब
शादी करने के लिए ज़ोर डाला तो उसने मेरी मन:सथ्ति को समझते हुए कहा कि वह अभी इंतज़ार करेगी। जब तक मैं शादी के लिए
तैयार न हो जाऊँ वह न तो मुझ पर दबाव डालेगी न हा अपने माता-पिता के कहीं और शादी
करने के प्रस्ताव को स्वीकार करेगी।
शशि अपने जीवन के इस नए मोड़ पर आ गया था।
अब उसका सबसे पहला लक्ष्य था अपनी बहनों को अच्छी शिक्षा देना, उनकी शादी कराना और
उनकी खुशियों का ख़्याल रखना। उसने माता-पिता दोनों की ज़िम्मेदारी ले ली। सविता
ने भी हर कदम पर उसका साथ दिया। उन्होने सभी लड़कियों की शादी बड़े-बड़े घरानों
में कर दी। इस दौरान उसकी सारी जमा-पूँजी, सविता के गहने सभी निकाल दिए गए। बहनों
को खुश देख वे बड़ी ही खुशी से रहते थे।
परंतु पैसा बड़ा बलवान होता है। वह रिश्ते
बनाता भी है और बिगाड़ता भी है। प्यार एक ऐसी डोर है जो रिश्तों को बांधे रखती है।
प्यार और पैसे की तक़रार ने शशि के जीवन में हीनता और उदासी की एक लहर दौड़ा दी।
शशि की बहनें अपने परिवार में अपने ग़रीब
भाई-भाभी को शामिल करने में झेंपती थीं। किसी से मुलाकात करवाने में उन्हें शर्म
आती थी। पर वे दोनों कभी भी इसका बुरा नहीं मानते थे। चुप-चाप उनसे मुलाकात करते
थे। पिता के समान शशि का दिल उन्हें देखे बिना नहीं मानता था।
उस दिन सविता अपनी सबसे ख़ूबसूरत साड़ी
पहन कर तैयार हुई थी। शशि सविता की ख़ूबसूरती को सराहता हुआ बोला – “सविता तुम जितनी सीरत से ख़ूबसूरत हो उतनी
ही सूरत से भी। ये बिंदी, चूड़ी, मोतियों
की माला, लिप्सटिक, काजल, झुमका तुम्हे और भी ख़ूबसूरत बना रहे
हैं।......................” सविता शर्माती हुई बोली – “आप भी जी! मज़ाक न उड़ाइए।
चलिए, देर हो रही है। शीतल की बेटी का पहला जन्मदिन है। मैं भी कई दिनों से उससे
नहीं मिली।”
शीतल, कमला, बिन्नी तीनों कीमती साड़ी,
जवाहरात तथा शान-बान से सजी थीं। आज उनके लिए बड़ा दिन था। उन्होंने जब सविता को
देखा तो हँसने लगीं – “भाभी कभी तो तैयार
हुआ करो। ये तो वही साड़ी है जो आपने कई आवसरों पर पहनी है। अपना नहीं तो हमारा ही
ख्याल करती। क्या कहेंगे मेरे मेहमान? भैया आप भी, यहाँ ऐसे मत आया कीजिए। अब आ ही गए हैं तो खाइए और जाइए।”
बहनों के ये स्वर शशि को तीर जैसे चुभ गए।
जीवन भर की तपस्या का ये फल पाकर वह चूर-चूर हो गया। सविता जो उसके हृदय के सबसे
समीप थी उसकी उन्होंने कई बार बेइज्ज़ती की थी पर आज शशि से रहा नहीं गया। वह वहाँ
से सविता का हाथ थामे बिना कुछ बोले चला आया।
शीतल के मेहमान उसके घर वालों के बर्ताव
को देख उसका उपहास करने लगे और बातें बनाने लगे। फिर शीतल और बाकी बहनें खाना लेकर
शशि के पास आईं पर आज शशि ने ज़िम्मेदारी के बंधनों को तोड़ने का निश्चय कर लिया
था। अब वह सम्मान व अपने प्यार के साथ जीवन बिताने का संकल्प कर चुका था। जब बहनें
आईं तो उसने कहा – “मैंने तुम लोगों के
लिए अपने सपने, अपने जीवन सभी को स्वाहा कर दिया। और अब में तुम्हारे लिए
शर्मिंदगी बन गया हूँ... समझ लो मैं तुम्हारे लिए मर गया। जाओ पैसे के बिस्तर पर
सोओ। भाई का प्यार अब तुम्हे नहीं मिलेगा।” फिर उसने दरवाज़ा बंद कर लिया। बहनें काफी देर तक दरवाज़े पर बैठी रहीं।
कभी खुद को कोसतीं, कभी सविता को, कभी माँ-पिताजी को याद करतीं। अंदर शशि भी रोता
रहा, परंतु उसने
दरवाज़ा नहीं खोला।