बुधवार, 2 सितंबर 2015

मालती

मालती
       अठारह वर्ष की उम्र में पहुँचते-पहुँचते मालती के मन ने भी उन सपनों को बुनना शुरु कर दिया था जो यौवनावस्था में सभी लड़कियाँ बुनती हैं। जीवन साथी के रूप में सच्चा प्यार करने वाले की चाह उसके मन में भी थी। एक ऐसा जीवन साथी जो उसके हर दुख:-सुख का साथी हो, जो उसे प्यार करे, उसका ख़्याल रखे, उसे अपने घर में इज़्जत भरा दर्जा दिलवाए। जिसे पाकर वह अपना सर्वस्व उस पर न्योछावर कर दे। सुखी जीवन की कल्पना मालती के मन में भी थी।
      रघु अधेड़ उम्र का मर्द था। जीवन में एक खूटे से बंधना उसे पसंद नहीं था। वह डाल-डाल पर जाकर रस चखने का शौकीन था। ढ़लती उम्र में उसने शादी करने का विचार किया, क्योंकि अब उसे कोई घास तक नहीं डालता था। रघु गाँव से शहर में आया था। गाँव के लोग समझते थे अब वह अपनी हरकतों से बाज आ चुका है। मेहनती बन गया है। खूब धन कमाने लगा है। मालती के माता-पिता से उसकी मुलाकात गाँव के स्टेशन पर हुई। मालती के पिता मालती की शादी में होने वाले खर्च तथा दहेज को लेकर दुखी थे। दहेज-प्रथा के कारण लड़कियाँ अपने माँ-बाप पर बोझ ही बन जाती है। मालती की माँ कहती है – रघु बाबू शादी की उम्र हो गयी है। जाने कब मालती का भाग्योदय होगा। लड़की जनना तो पाप ही बन गया है। अब तो लाखों रुपए दहेज हो गया है। क्या करेंगे हम? बड़े परेशान है। रघु कुछ नहीं बोला। फिर वे लोग अपने-अपने घर चले आए।
      छरहरे बदन वाली, कोमल नाज़ुक सी मालती बारामदे में माँ-पिताजी का इंतज़ार कर रही थी। वे पास के गाँव में शादी में गए थे। मालती गाँव की सबसे खूबसूरत लड़कियों में से एक थी। तीखे नैन-नक्श, पतले गुलाबी होठ, मीठी आवाज़ और उन्मुक्त हरकतों के कारण वह सब की चहेती और प्यारी थी। रघु ने जब मालती को देखा तो बेचैन हो गया। उसे पाना उसका लक्ष्य सा बन गया। वह बहाने से रोज़ उसके घर पहुँच जाता। मालती को उसका आना अच्छा नहीं लगता था। उसकी आँखों में बसी हैवानियत उसे साफ़ दिखती थी। पर वह किसी से कुछ बोलती नहीं थी। इधर रघु उसके माता-पिता से शादी की बात कर बैठा और दहेज में मात्र बीस हज़ार रुपए माँगे। मालती के माता-पिता ने इस पर विचार किया। अपने नाते-रिश्ते वालों से बातें की। सभी ने कहा लड़का तो अधेड उम्र का है, पर दहेज तो मानो कुछ भी नहीं है। लड़की का भाग्य विधाता ही जाने। तुम लोग ही सोचो क्या करना है? वैसे अगर लड़की के भाग्य में सुख है तो मिलेगा ही। हमारे विचार से शादी कर ही दो। कहाँ इधर-उधर भटकते फिरोगे। ईश्वर ने कुछ विचार कर ही यह रिश्ता भेजा होगा। मालती भी अपने माता-पिता की लाचारी के आगे सिर नहीं उठा पाई और देखते-देखते रघु की घरवाली बन गयी।
शादी के दिन ही रघु उसे घर ले आया। घर में रघु के आलावा सिर्फ एक चचेरा भाई था घनश्याम। रघु मालती को बस हवस पूरी करने का ज़रिया मानता था। न उससे बातें करता, न उसे देखता और न उसका ख़्याल रखता। वह शराब पीता, आती जाती लड़कियों/महिलाओं को छेड़ता और फिर यहाँ-वहाँ पड़ा रहता।
मालती के सारे अरमान पानी में बह गए। वह अब बस एक वस्तु मात्र थी। घर का सारा खर्च घनश्याम उठाया करता था। मालती बस अपना काम करती रहती थी। घनश्याम मालती की इज़्जत करता था। उसका ख़्याल रखता था। धीरे-धीरे मालती के मन में घनश्याम के प्रति प्यार का भाव पनपने लगा। वह उसे देखकर खुश होती थी। उसकी बातें, उसका चेहरा हर वक्त उसकी आँखों के सामने घूमता रहता था। मालती के मन में पनपा यह प्रेम-भाव अशरीरी था। वह सच्चे हृदय से उससे प्रेम करती थी। उसकी भलाई सोंचती थी। अब उसके जीवन का एक ही लक्ष्य था – घनश्याम को फलता-फूलता देखना। घनश्याम भी उसका बहुत आदर करता था। प्रेम का पवित्रतम रूप उनके रिश्ते को बांधे हुए था।

घनश्याम के ऑफिस में मीना काम करती थी। वह मन ही मन उसे चाहती थी। उसने अपनी चाहत का इज़हार करने की कोशिश कई बार की, पर कर न पाई। एक बार वह मालती से मिली इसने यह बात मालती को बताई। मालती अत्यंत प्रसंन हुई। कुछ समय बाद घनश्याम और मीना का ब्याह हो गया।

मीना मालती की तरह खूबसूरत नहीं थी और न ही उसमें सहनशक्ति थी। घर में आने के बाद मालती उसे रघु से मिलने नहीं देती थी, क्योंकि मालती रघु को अच्छी तरह जानती थी। पर मीना को इससे संदेह होने लगा। वह मामला समझने में असमर्थ थी। घनश्याम और मालती के बीच बने अपनेपन और प्रेम ने उसके मन में शररा बीज बो दिया। घनश्याम कई बार मालती का गुणगान किया करता था। मालती मन ही मन मालती से जलने लगी।

एक रोज़ रघु ने शराब के नशे में मालती को बहुत पीटा, इससे घनश्याम बहुत क्रोधित हो गया और रघु को घर से निकाल दिया। साथ ही उसने रोती-बिलखती मालती को गले से लगा लिया। उसी वक्त मीना आ गयी। उस दृश्य ने उसके शक को यक़ीन में परिवर्तित कर दिया। अब तो रोज़ ही लड़ाई होने लगी। मालती इस सब का दोषी खुद को मानने लगी। अब वह घनश्याम के कक्ष की ओर भी नहीं जाती थी। एक अजनबीपन उनके रिश्ते में पैठ गया। उधर मीना अपनेआप को सुरक्षित महसूस नहीं करती थी। वो आधुनिक मानसिकता की लड़की थी। पति से बंधे रहना, किसी भी हाल में ज़िंदगी गुज़ार लेना, उसे पसंद नहीं था। वह स्वतंत्र थी, स्वावलंबी थी, इसलिए उसने घनश्याम से रिश्ता तोड़ने का निश्चय किया। इसके लिए वह कोट तक गई। मालती और घनश्याम का पवित्र रिश्ता बदनाम होने लगा। मीना ने तलाक ले लिया। मालती को यह लांछन और अपने प्रिय घनश्याम की टूटी गृहस्थी ने बहुत द्रवित किया। उसने घर छोड़ने की ठान ली। वह रधु से कुछ बोलने का साहस भी नहीं कर पाती थी पर आज बोली – तुम तो कई बार कई स्त्रियों से संबंध बना चुके हो। क्या तुम्हें यक़ीन है कि मैं पवित्र हूँ। रघु ने तो इस बारे में कभी सोंचा ही नहीं वह बोला – पवित्र- वह क्या होता है? ऐश कर लिया तो कर लिया- अब जा। मालती निराश हो गयी। वह चुपचाप घर से निकल पड़ी। उसे नहीं पता था, वो कहाँ जा रही है? कैसे ज़िंदगी बिताएगी? बस घनश्याम के जीवन में अपनी छाया तक नहीं डालने के प्रयोजन से वह वहाँ से चली गयी।    


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