बुधवार, 30 अगस्त 2017

स्वच्छाग्रह का संकल्प

स्वच्छाग्रह का संकल्प
                                                         शिल्पी सिन्हा..

स्वच्छ, निर्मल, सुन्दर, मनभावन भारत देश हमारा था,
नदियां कल-कल बहती थीं, पक्षी कलरव करते थे।।
हिमालय के आंगन में स्वच्छता का प्रसार था,
संपूर्ण विश्व भारतीय संस्कृति पर करता अभिमान था।।

पर आह ! माँ के लाल ने,
उन्नति की ओर उड़ान में,
तंत्र के प्रसार में,
तकनीक के वार से,
और आलस हज़ार से,
माँ को ही बिसार दिया।।

निर्मल स्वच्छ धरा को मलिन व दूषित कर दिया।
नदियां, मृदा, आकाश, वायु सब को संदूषित कर दिया।।
अब बीमारियां हमें घेर रहीं, मृत्यू तांडव कर रही।
आबादी की अधिकता भी इसमें अपना कुछ जोड़ रही।।

सरकार ने भी अब राजनीति छोड़ स्वच्छाग्रह है छेड़ दिया।
आओ मिलकर हम भी संकल्प लें, आलस तज स्वच्छता अपनाएं।
पुरानी आदतों को बदल, विश्व स्तर पर भारत को सम्मान दिलाएं।
बच्चे, बूढ़े, युवा, महिलाएं, सब मिलकर, स्वच्छ संकल्प लें और स्वच्छ सिद्धि पाएं।।


                                                           

बुधवार, 23 अगस्त 2017

अधूरे एहसास

तुम कौन हो,
जो आते हो दिल में उतर के अपना बनाने को जिद करते हो,
तुम्हें पाना नहीं है मुझे तुम्हें खोना भी नहीं है।

तुम्हारी आंखों से खुद को देखना मुझे है,
गले लगाना नहीं है,
दूर जाना नहीं है,
पास आओ अगर तुम मुस्कुराना नहीं है ।

ख्वाब देखे है मैंने, पूरा उन्हें करना नहीं है।
जो मिली हैं खुशियां मुझे, उनसे सुकून पाना नहीं है।

तुम्हें देखना, तुम्हारी आवाज को तरसना,
यही है बस यही है सब,
अधूरे एहसास को पूरा करना नहीं है।

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

ग़म के परत


                                         ग़म के परत

आंखों से ढलते आँसू, कभी तेज़, कभी धीमी गति से गिरते हैं।
रफतार कभी ग़म  मिटा देती है, कभी फासले कम कर देती है।

पर धीमी गति से ढुलकते आँसू, मात्र पिधले ग़म बन रह जाते हैंं,
जो फिर जम कर और सख़्त बन जाते हैंं।।

कहते थे कभी कि रोके हम ग़मे नासूर निकालते हैं,
पर अब तो ग़म की बस परत चढ़ाते हैं हम।।
                                                                    -- शिल्पी सिन्हा