ग़म के परत
आंखों से ढलते आँसू, कभी तेज़, कभी धीमी गति से गिरते हैं।
रफतार कभी ग़म मिटा देती है, कभी फासले कम कर देती है।
पर धीमी गति से ढुलकते आँसू, मात्र पिधले ग़म बन रह जाते हैंं,
जो फिर जम कर और सख़्त बन जाते हैंं।।
कहते थे कभी कि रोके हम ग़मे नासूर निकालते हैं,
पर अब तो ग़म की बस परत चढ़ाते हैं हम।।
-- शिल्पी सिन्हा
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